कपास की फसल | बोने का तरीका और रोग

आज हम कपास की फसल के बारे में बात करेंगे इसको किस महीने में बोया जाता है किस तरिके से बोया जाता है कोनसी खाद व् कितनी दी जाती है किस समय दी जाती है।

किस समय पानी दिया जाता है व् पूरी फसल बोने से रुई निकालने तक कितने पानी लगाए जाते है और रोग व् प्रबंधन के बारे में बात करेंगे।

कपास की फसल बोने का समय

कपास की फसल से अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए इस फसल को मई माह में बिजाई करनी चाहिए अप्रैल माह में खेत को तैयार कर मई माह में इस फसल की बिजाई कर देनी चाहिए मई माह से देरी करने पर यह फसल पछेती हो जाती है

बोने का तरीका व् बीजदर प्रति एकड़

  • नरमा में 4 किल्लो प्रमाणित बिज़ प्रति एकड़ डालना चाहिए।
  • नरमा का बीज लगभग 4 से 5 सेंटीमीटर की गहराई पर डाले
  • बुवाई कपास ड्रिल से ( सवा दो फुट )की दुरी में कतारों में करे।
  • संकर किस्मो की बुवाई बीज रोपकर डिब्लिंग करे। इसमें एक किलो प्रति बीघा की दर से बीज की आवयसकता होगी।
  • इसके पौधे 120 से 150 सेंटीमीटर ऊँचे एव पकाव अवधि 170 से 180 दिन है।

खाद व् पानी

इसमें बुवाई पूर्व अंतिम जुताई के समय 1/3 भाग नत्रजन फास्फोरस तथा पोटास की पूरी मात्रा ड्रिल करके पाटा लगा दे। नत्रजनली शेष मात्रा का आधा हिस्सा (50किग्रा)पहली सिंचाई पर तथा शेष 5० किलोग्राम दूसरी सिंचाई पर देवे। नरमा कपास की बुवाई का समय चल रहा है।

नरमा की पहली सिंचाई या उसमे पानी बिजाई के 20 से 25 दिन में करनी चाहिए। तब तक नरमा के पौधे उग जाते है। वैसे तो नरमे के पोधो को उगने में 6 से 8 दिन का समय लगता है। बिजाई के एक सप्ताह के अंदर पौधे उग जाते है।

पोटास खाद का उपयोग नरमे की फसल में करने से इनमे सूखा सहन करने समता बढ़ती है। और इसकी गुणवत्ता में इज़ाफ़ा होता है। इसके आलावा इसके पौधों में प्रतिरोधक समता बढ़ती है।

व् नरमे की फसल के लिए गहरी सिंचाई करना आवयसक है

सिंचाई की अवस्ता

  • बुवाई के 15 दिन बाद।
  • पौधे से साखा निकलने के बाद।
  • फूल व् फल निकलने के समय।
  • रुई निकालने के एक सप्ताह पहले।
  • रुई निकालने के बाद।

रोग व् लक्षण

जड़ गलन रोग

यह रोग मुख्यत पहली सिंचाई के बाद 40 से 45 दिन में दिखना सुरु होता है ऐसे पौधे हाथ से खींचने पर आसानी से उखड़ जाते है और ये अचानक से मुरझा कर सुख जाते है।

पती धब्बा रोग

इससे संक्रमित पोधो के पत्तियों पर भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते है। जो अनियमित आकर व् गोल धब्बे होते है। इन धब्बो का बाहरी हिस्सा गुलाबी रंग का होता है कई धब्बे आपस में मिलकर एक बड़ा धब्बा बना लेते है। रोग के कुछ समय बाद इसके बिच का हिस्सा गिर जाता है। इस बचे हुए छेद को शूट होल कहते है।

सितम्बर माह में झुलसन नामक रोग नरमे की फसल में आ जाता है क्योंकि इस समय फसल में पानी की कमी आ जाती है जिससे फसल नाइट्रोजन ,फास्फोरस ,मेगनीसियम की कमी आ जाती है फसल के पत्ते लाल हो जाते है व् फल सुख जाते है

रोग प्रबंधन

बिज़ उपचार

पोधो को जमीन से उत्त्पन्न बहुत से फ़फ़ूँदो से तथा बिज़ में रहने वाले जीवाणु से बचाव के लिए फंफूदनाशक दवाइयों से उपचारित करे।

  • जिन खेतो में पिछले वर्ष जड़ गलन रोग हुआ वो पुरे 3 वर्ष तक इस फसल का उत्पादन न करे
  • सूखे खेत में सिंथेटिक दवाई वाली स्प्रे न करे
  • फसल में किसी रोग ग्रसित पौधे को देखे तो उसे जड़ से उखाड़ कर मिट्टी में दबा दे ,या जला देना चाहिए जिससे वह रोग दूसरे पोधो में न फैले।
  • समय समय पर फसल में कीटनाशक का प्रयोग करना चाहिए।
  • किसी भी कीटनाशक का प्रयोग फसल में उसकी निश्चित मात्रा के अनुसार ही करना चाहिए नहीं तो फसल खराब भी हो सकती है।

रुई निकालने का समय

रुई निकालने का समय मुख्यत 20 सितम्बर से 20 ऑक्टूबर के मध्य पोधो से रुई निकाली जाती है रुई निकालने का कार्य किसी भी मशीन के द्वारा नहीं किया जाता है।

अधिकतर रुई लोग हाथो से निकालते है। 10 से 12 क्विंटल प्रति बीघा रुई का उत्पादन हम कर सकते है।

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